शादी के बहाने महिला से संबंध बनाने पर अकेले दोषी नहीं पुरुष, कोर्ट ने दिया ऐसा फैसला

चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि एक पुरुष, जिसने एक विवाहित सहमति से शादी करने के बहाने शारीरिक संबंध बनाए हैं, ऐसे मामले में उसे अकेले को पूरी तरह से दोषी नहीं माना जा सकता है। जस्टिस सुदीप अहलूवालिया ने कहा कि इस मामले में प्राथमिकी को देखने से पता चलता है कि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि पुरुष ने महिला के साथ जबरन यौन संबंध बनाए।

मामला केवल यह था कि शिकायतकर्ता महिला के साथ याचिकाकर्ता पुरुष ने शादी करने का वादा किया था, क्योंकि शिकायतकर्ता महिला के अपने पति के साथ संबंध ठीक नहीं थे। आराेपित को जमानत देते हुए हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यह सहमति से शारीरिक संबंध बनाने का स्पष्ट मामला प्रतीत होता है। इसमें परिस्थितियों के कारण शादी संभव नहीं हुई ।

हाई कोर्ट ने यह फैसला दुष्कर्म और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति अधिनियम के प्रविधानों के तहत दर्ज एक मामले में जमानत की मांग करने वाली याचिका पर दिया। आरोपित के खिलाफ कुरुक्षेत्र जिले के बाबैन पुलिस स्टेशन में 17 मार्च को यह मामला दर्ज किया गया था। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में शिकायतकर्ता की उम्र को लेकर एफआइआर में ही कुछ नहीं बताया गया। एक कालम में पता चला कि उसका जन्म वर्ष 1991 था। इस तरह, उसने बहुत पहले ही व्यस्क होने की आयु पार कर ली थी।

कोर्ट के अनुसार यह दो पक्षों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध का एक स्पष्ट मामला प्रतीत होता है और दोनों के बीच विवाह कम से कम तब तक संभव नहीं था, जब तक कि शिकायतकर्ता की पहली शादी समाप्त नहीं होती। कानूनन अब तक उसकी पहली शादी चल रही है। ऐसी परिस्थितियों में याचिकाकर्ता को मामले में पूरी तरह से दोषी नहीं माना जा सकता है, भले ही उसके खिलाफ आरोप लगाए गए हो।

कोर्ट ने एससी एसटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इस बाबत एफआइआर में कोई उचित आधार नहीं है। ऐसा कोई आरोप नहीं था कि याचिकाकर्ता ने पूरी तरह से अनुसूचित जाति से संबंधित होने के कारण शिकायतकर्ता का अपमान किया या उसे पीड़ित किया। इस मामले में एससी एसटी अधिनियम जोड़ना किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

हाई कोर्ट ने आरोपित को नियमित जमानत देने का आदेश देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। इसी के साथ हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को सलाह दी कि वह इस मामले में हाई कोर्ट द्वारा की गई प्रतिक्रिया से प्रभावित हुए बगैर मामले का मेरिट पर निपटारा करे।