मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर बड़ा खुलासा, सुप्रीम कोर्ट ने…

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़े 77 मुकदमे बिना कोई उचित कारण बताए वापस ले लिए हैं. सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी गई है. कोर्ट को सौंपी रिपोर्ट में मांग की गई है कि राज्य सरकार को सभी मामलों के लिए उचित कारण बताते हुए दोबारा आदेश जारी करने को कहा जाए. सभी आदेशों की इलाहाबाद हाई कोर्ट समीक्षा करे.

सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों सांसदों/विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमा के तेजी से निपटारे के लिए विशेष अदालतों के गठन पर सुनवाई चल रही है. कोर्ट ने सभी राज्यों में लंबित इस तरह के मुकदमों की जानकारी मांगी थी. इससे पहले हुई सुनवाई में कोर्ट ने यह निर्देश भी दिया था कि बिना हाई कोर्ट की अनुमति लिए सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मुकदमे राज्य सरकार वापस नहीं ले सकती.

मामले में एमिकस क्यूरी नियुक्त किए गए वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने कोर्ट को पिछली सुनवाई में जानकारी दी थी कि यूपी सरकार कई वर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधियों के ऊपर मुजफ्फरनगर दंगे में लंबित मुकदमों को वापस लेने की तैयारी कर रही है. हंसारिया ने यह भी बताया था कि तमाम राज्य सरकारें सीआरपीसी की धारा 321 के तहत मिली मुकदमा वापस लेने की शक्ति का दुरुपयोग करती हैं. कई राज्यों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मुकदमे इसी तरह वापस लिए गए हैं.

मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर 510 मुकदमे हुए थे दर्ज
अब कोर्ट को सौंपी नई रिपोर्ट में एमिकस क्यूरी ने बताया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़े कुल 77 मामले वापस लेने का आदेश जारी किया है. इनमें से कई मामले सांसदों और विधायकों से जुड़े हैं. हंसारिया ने बताया है कि 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर कुल 510 मुकदमे दर्ज हुए थे. इनमें से 175 में चार्जशीट दाखिल की गई थी. 165 मुकदमों में क्लोजर रिपोर्ट लगाई गई थी. जबकि 170 मुकदमों को निरस्त कर दिया गया था. अब राज्य सरकार ने 77 मुकदमों को बिना कोई उचित कारण बताएं वापस लेने का आदेश दिया है.

रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट से दरखास्त की गई है कि वह राज्य सरकार को सभी मामलों के लिए अलग-अलग कारण बताते हुए आदेश जारी करने को कहे. सरकार से यह भी कहा जाए कि वह यह बताए कि क्या यह मुकदमा बिना किसी ठोस आधार के, दुर्भावना के तहत दर्ज कराया गया था. रिपोर्ट में कोर्ट को दूसरे राज्यों के बारे में भी जानकारी दी गई है. बताया गया है कि कर्नाटक में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ 62, केरल में 36, तेलंगाना में 14 और तमिलनाडु में चार मुकदमे बिना कोई कारण बताए वापस लिए गए हैं.