बम-कट्टे वालों से हवाई चप्पल लेकर मुकाबला करने चले हैं ताहिर, ट्विस्ट और खूनी संघर्ष से भरी है सीरीज

नई दिल्ली। ये काली काली आंखें गाना तो हम सभी को याद है. शाहरुख खान की फिल्म ‘बाजीगर’ का ये रोमांटिक गाना आज भी फैंस की जुबान पर चढ़ा है. ऐसे में अगर इस नाम से कोई वेब सीरीज आए तो सुनने वाले को यही लगेगा कि वो रोमांटिक होगी. लेकिन जनाब ऐसा है नहीं. ताहिर राज भसीन, श्वेता त्रिपाठी और आंचल सिंह स्टारर वेब सीरीज ‘ये काली काली आंखें’ एक क्राइम थ्रिलर है.

क्या है सीरीज की कहानी?

ये कहानी है विक्रांत सिंह चौहान (ताहिर राज भसीन) की जो एक तरफा प्यार का शिकार हो गया है. शिकार इसलिए क्योंकि जब से शहर के पावरफुल पॉलिटिशियन अखेराज अवस्थी विद्रोही (सौरभ शुक्ला) की बेटी पूर्वा (आंचल सिंह) की नजर उसपर पड़ी है, उसका जीना हराम हो गया है.

कहानी की शुरुआत होती है एक लुटे-पिटे छुपकर रहते विक्रांत से, जिसे मारने कई बंदूकधारी लोग आते हैं. इसके बाद विक्रांत अपनी कहानी सुनाना शुरू करता है. विक्रांत के पिता श्रीकांत (बृजेन्द्र काला), अखेराज के यहां अकाउंटेंट हैं. साथ ही अखेराज के बड़े फैन भी हैं. अखेराज की ही मदद से विक्रांत का एडमिशन एक बड़े स्कूल में होता है, जहां उसकी बेटी पूर्वा पढ़ती है. पूर्वा को छोटी उम्र में ही विक्रांत भा जाता है. लेकिन विक्रांत को समझ आ जाता है कि पूर्वा का उसके जीवन से जुड़ना उसके ग्रहों का खराब होना है. ऐसे में जब पूर्वा, विक्रांत से दोस्ती के लिए पूछती है, वो मना कर देता है. इसके कुछ समय बाद पूर्वा शहर छोड़कर बाहर चली जाती है.

कहानी आगे बढ़ती है और अब विक्रांत बड़ा हो चुका. कॉलेज में उसे शिखा अग्रवाल (श्वेता त्रिपाठी शर्मा) मिली, जिससे वो प्यार करता है. विक्रांत और शिखा साथ में जिंदगी बिताना चाहते हैं. विक्रांत इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुका है और अब नौकरी पाकर अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करने और शिखा से शादी के सपने देख रहा है. लेकिन इन सपनों पर ग्रहण लगाने के लिए शिखा शहर में वापस आ जाती है. इतने सालों से दूर रही पूर्वा का विक्रांत के लिए मोह अब जूनून बन चुका है.

पूर्वा का एक ही मकसद है- विक्रांत को अपना बनाना. उसका बाप पावरफुल है और अपनी बेटी से बेहद प्यार भी करता है, तो वो उसकी इच्छा कैसे पूरी नहीं करेगी! बस इसी में विक्रांत की जिंदगी की लंका लग जाती है. अब आगे कैसा खूनी नाच होगा यही सीरीज में देखने वाली बात है.

सीरीज में ताहिर राज भसीन का काम अच्छा है. इसका एक कारण ये है कि वह अच्छे एक्टर हैं और दूसरा यह कि उन्हीं के किरदार की कहानी में बढ़ोतरी होती दिखाई गई है. बाकी सब मानों विक्रांत की कहानी के प्यादे हैं जिन्हें कहानी आगे बढ़ाने के लिए रखा गया है. पूर्वा के जुनूनी आशिका के रोल में आंचल सिंह ने अच्छा काम किया है. शिखा के किरदार में श्वेता त्रिपाठी शर्मा का काम बढ़िया है. सौरभ शुक्ला, सूर्या शर्मा, बृजेन्द्र काला, अनंत जोशी संग अन्य किरदारों ने अपने किरदारों को बढ़िया तरीके से निभाया है.

डायरेक्टर सिद्धार्थ सेनगुप्ता ने ‘ये काली काली आंखें’ की कहानी को काफी खींचा है. ये सीरीज 8 एपिसोड की है और एक समय के बाद बेहद लंबी लगने लगती है. सीन्स और एपिसोड्स के बीच का गैप आपके दिमाग पर हावी होने लगता है और आप सोचते हैं कि जो देखना है स्किप करके देखकर खत्म करते हैं यार. वहीं दूसरी तरफ ऐसी ही चीजें आपके अंदर सीरीज को लेकर दिलचस्पी भी काफी हद तक बढ़ाती है और आप अपनी सीट पर जमे रहते हैं, ये देखने के लिए कि आगे क्या होता है.

प्यार, पावर, जूनून, और खूनी संघर्ष की इस कहानी में बहुत सी कमियां हैं. सीरीज में फालतू के जोक और फालतू की गालियों को घुसाया गया है. सीरीज की कहानी शुरूआती एपिसोड्स में आगे बढ़ती नजर आई, लेकिन इसके बाद काफी कुछ गुड़-गोबर भी हो गया. डायरेक्टर सिद्धार्थ के दिमाग में शायद सीरीज का दूसरा सीजन ही चल रहा था. इसलिए वह पहले को बहुत स्ट्रॉन्ग नहीं बना पाए. फिर भी कई बातों को ध्यान में रखा जाए तो ये सीरीज काफी हद तक एंगेजिंग है. इसका अंत देखने के बाद साफ है कि दूसरा सीजन भी आएगा. आगे डायरेक्टर सिद्धार्थ क्या कमाल दिखाएंगे, ये देखने वाली बात होगी.