प्राइवेट अस्पताल ने इलाज के वसूले 1.80 करोड़ रुपये, बिल देखकर मेड‍किल जगत भी सन्न

नई दिल्ली। 1 करोड़ 80 लाख… यह रकम किसी नए महंगे घर को खरीदने का नहीं, बल्कि एक मरीज के इलाज का बिल है। कोरोना के इलाज के लिए एडमिट एक मरीज से अस्पताल ने इतनी रकम का बिल वसूल लिया। इससे एक बार फिर से कॉरपोरेट अस्पतालों के बिल को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इससे पहले भी दिल्ली-एनसीआर में अस्पतालों के भारी-भरकम बिल पर बवाल मच चुका है। लेकिन, ऐसे बिल के पीछे अस्पताल के क्या तर्क हैं, वे क्या सोच रखते हैं… इसे ऐसे डिकोड किया जा सकता है।

अस्पताल की बिल्डिंग बाकी बिल्डिंग से अलग कैसे
चाहे अस्पताल हो या घर की बिल्डिंग, बनती तो सीमेंट और ईंट से ही है। लेकिन दोनों में फर्क है। अस्पताल को हेल्थकेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर के अनुसार बनाया जाता है। एंट्री-एग्जिट से लेकर सेफ्टी तक का ख्याल रखा जाता है। मजबूती और सेफ्टी ज्यादा होती है। पाइपलाइन बिछी होती है, जिसमें गैस से लेकर वॉयर तक जाती है। स्टरलाइजेशन से लेकर बाकी सुविधाएं दी जाती हैं, जिससे लागत महंगी हो जाती है। एक कमरे का चार्ज अगर एक फाइवस्टार होटेल में 7000 रोज का है, तो वही बेड कॉरपोरेट अस्पताल में 10-12 हजार का हो जाता है।

ICU तो 35 हजार का है, लेकिन खर्च एक लाख का
इस बारे में डॉ. अंशुमान ने कहा कि अस्पताल आईसीयू का एक दिन का खर्च 35-40 हजार बताते हैं, लेकिन उसका बिल एक लाख तक का आ सकता है, खासकर जब मरीज वेंटिलेटर पर होता है। जबकि एक एडवांस वेंटिलेटर की कीमत सिर्फ 12 से 14 लाख है। इसके अलावा मॉनिटर, इनफ्यूजन, इनट्यूबेशन चार्ज, वेंटिलेटर चार्ज, वेंटिलेटर मेंटनेंस, डॉक्टर विजिट, नर्सिंग विजिट, दवा का चार्ज अलग से होता है और यह बिल एक लाख तक पहुंच जाता है। न तो वेंटिलेटर की कीमत इतनी है कि इस पर इतना चार्ज लिया जाए। इसके लिए सरकार 24 से 48 घंटे का पैकेज बना दे और अस्पताल दवा का चार्ज अलग से ले, क्योंकि हर मरीज की दवा और डोज अलग होती है। लेकिन ज्यादातर सुविधाएं, आईसीयू और वेंटिलेटर एक ही तरह के होते हैं और चार्ज भी वही हो।

एक्मो का रोजाना चार्ज 1.70 लाख से 3 लाख तक
डॉ. अंशुमान ने बताया कि एक्मो मशीन शरीर से बाहर आर्टिफिशियल लंग्स का काम करती है और इसकी कीमत सिर्फ 35 लाख है। इसमें अलग से मेंब्रेन और कंज्यूमेबल लगता है, जो लगभग 3 लाख का होता है। लेकिन, इस मशीन के लिए एक दिन का चार्ज एक लाख 70 हजार से लेकर 3 लाख तक वूसलने की बात सामने आ चुकी है। सरकारी सेंटरों में यह मशीन न के बराबर है और प्राइवेट अस्पताल कई गुना ज्यादा वूसल करते हैं। सरकार की तरफ से भी इस पर कोई कैपिंग नहीं है।

दिल्ली सरकार के तहत फ्री है आईसीयू
दिल्ली सरकार के जीबी पंत अस्पताल के डॉ. युसूफ जमाल ने बताया कि अगर हमारे यहां कोई मरीज आईसीयू या वेंटिलेटर पर जाता है, तो सब फ्री है। मरीज को इसके लिए एक पैसा भी नहीं देना पड़ता। वेंटिलेटर, ट्यूब, एंटीबायोटिक्स, आईसीयू, एनेस्थेटिक, डॉक्टर विजिट सारी चीजें मुफ्त हैं।

मैक्स का बिल सुनकर डॉक्टर भी सन्न
मामले में मैक्स साकेत अस्पताल के 1 करोड़ 80 लाख के बिल को सुनकर डॉक्टर भी सन्न हैं। उनका कहना है कि यह देश का सबसे महंगा इलाज है, जिसका किसी ने भुगतान किया है। डॉक्टरों का कहना है कि अस्पताल के बिल को डॉक्टरों की फीस न समझें, वह फीस तो मात्र एक छोटा-सा हिस्सा होता है। दरसअल, यह कॉरपोरेट अस्पतालों का अपने तरीके से काम करने और बिल जेनरेट करने का मॉडर्न सोच है। यहां एडमिट होने से पहले न तो मरीज को कोई दिक्कत होती है, न वे सवाल उठाते हैं और न ही इस मनमानी पर अंकुश के लिए सरकार के पास कोई तरीका है।

पहले भी ऐसे कई मामले आ चुके हैं सामने
2017 में डेंगू पीड़ित एक बच्ची के इलाज के एवज में गुरुग्राम स्थित फोर्टिस अस्पताल ने 18 लाख का बिल बनाया था, जबकि बच्ची की जान भी नहीं बची थी। उस दौरान भी बिल में मनमानी का आरोप लगा था, जब 2700 ग्लव्स और 660 सीरिंज के इस्तेमाल के पैसे लिए गए थे। इसी तरह, 2017 के दिसंबर में गुरुग्राम के मेदांता में डेंगू के 22 दिन के इलाज का बिल 15.88 लाख का आया था, जबकि 7 साल के बच्चे शौर्य प्रताप की मौत हो गई थी। गौरतलब है कि निजी अस्पतालों के ऐसे भारी-भरकम बिल के मामलों के मद्देनजर दिल्ली सकरार ने एक कमिटी बनाई थी, जिसने रेट तय करने के लिए कैपिंग पर जोर दिया था। इस बाबत कमिटी ने कुछ सुझाव दिए थे, जिसका ड्राफ्ट भी तैयार किया गया था।