किसान आंदोलन से यूपी में नहीं पडेगा फर्क, बंपर वोटो से जीतेगी भाजपा, समझिये पूरा गणित

लखनऊ। यूपी के आगामी विधानसभा चुनावों ने किसान आंदोलन में नई जान फूंक दी है। ये आंदोलन सितंबर 2020 में संसद में पास हुए तीन कृषि आंदोलनों के खिलाफ हैं। 5 सितंबर को पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर में हजारों किसान राकेश टिकैत की महापंचायत में जुटे थे। इसमें भारतीय किसान यूनियन नेता ने किसानों का आह्वान किया कि वे 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी को हरा दें।

लेकिन इन घटनाओं को महज चुनावों से जोड़कर देखना ठीक नहीं है। हमें किसानों के असंतोष को केवल चुनावों से पहले का आक्रोश नहीं मानना चाहिए। यह आंदोलन लंबे समय से चल रहा है। इसी से पता चलता है कि किसानों की आशंकाएं कितनी गंभीर हैं। पिछले कुछ दशकों में उन्‍हें खेती में महंगी लागत और कम मुनाफे की समस्‍या से जूझना पड़ा है। इसके अलावा उन्‍हें दूसरे वर्गों से भी प्रतिद्वंद्व‍िता का सामना करना पड़ता है।

किसान संगठनों का दबदबा हुआ कम
लेकिन इनकी आशंका और डर का सबसे बड़ा कारण है किसान संगठनों के राजनैतिक दबदबे में लगातार कमी होना। एक जमाने में जनसंख्‍या और कृषि अर्थव्‍यवस्‍था के दम पर ये संगठन समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में हावी थे। लेकिन पिछले 20 साल में यूपी की राजनीति में किसानों का हिस्‍सा कम हुआ है, खासकर पश्चिमी यूपी में। इस क्षेत्र की 44 सीटों पर साल 2017 में चुने गए विधायकों में से केवल 10 ने कृषि को अपना मुख्‍य व्‍यवसाय बताया है, जबकि साल 2012 में इनकी संख्‍या दोगुनी यानि 20 थी। इसके साथ ही, व्‍यापार को मुख्‍य व्‍यवसाय बताने वाले एमएलए की संख्‍या भी 18 से बढ़कर 25 हो गई है। इन 25 व्‍यापारी-विधायकों में से केवल सात ही किसान समुदाय (5 जाट और दो गुर्जर) से हैं। बाकी सात अपर कास्‍ट से, चार एसएसी, तीन मुस्लिम और बाकी ओबीसी हैं।

बदलते राजनीतिक रुझान
किसानों की कमजोर होती पकड़ का एक दूसरा कारक है सीटों का लगातार अलग-अलग पार्टियों के खाते में जाना। चुनाव दर चुनाव ये सीटें न केवल अलग-अलग पार्टियों के कब्‍जे में आईं बल्कि इन पर अलग-अलग जातियों का अधिकार रहा। साल 2017 में 44 में से केवल 6 सीटें ही ऐसी थीं जिन पर उसी दल के उम्‍मीदवार जीते जिन्‍होंने पिछले चुनाव में जीत हासिल की थी। 32 सीटों पर बदलाव देखा गया। केवल 12 सीटों पर उसी जाति के उम्‍मीदवार जीते जिस जाति के उम्‍मीदवार पहले विजयी हुए थे।

यूपी की राजनीतिक बिसात पर कम से कम पांच समूह एक दूसरे के आमने-सामने हैं। अगर बीजेपी विधायकों में मुस्लिमों की गैरमौजूदगी वाले तथ्‍य को छोड़ दिया जाए तो दलों और जातियों के बीच कोई स्‍थायी संबंध नहीं दिखाई देता। इससे भी चुनावों की अनिश्चितता को बढ़ावा मिलता है।

ऐसे में किसी क्षेत्र को किसी पार्टी या जाति का गढ़ बताना बेमानी लगता है। जिन 12 सीटों पर उसी जाति के उम्‍मीदवार जीते उनमें से केवल एक, शामली पर जाट एमएलए थे। बाकी पांच सीटों (देवबंद, मुजफ्फरनगर, साहिबाबाद, गाजियाबाद, शिकारपुर) पर सवर्ण जीते। तीन गुर्जर एमएलए गंगोह, बागपत और दादरी से विजयी हुए। दो जाटव एमएलए रामपुर मनिहारन और हापुड़ की रिजर्व सीट से जीते और एक सैनी जाति के एमएलए को नकुड़ से जीत मिली।

नए जमाने की राजनीति
यूपी के दूसरे हिस्‍सों की तुलना में पश्चिमी यूपी में पुराने खेतिहर वर्ग की जगह अब नई उम्र के नेता आ गए हैं। इसी का नतीजा है कि किसान आंदोलनों से किसान वर्ग भी अब धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है।

क्‍या बीजेपी को होगा नुकसान
सवाल उठता है कि क्‍या ये आंदोलन 2022 में बीजेपी की उम्‍मीदों को नुकसान पहुंचा सकते हैं? कम से कम तीन कारणों से तो लगता है कि ऐसा नहीं हो पाएगा।

पहले भी नाराजगी का असर नहीं
पहला कारण, यह पहली बार नहीं है कि किसान, खासकर जाट किसान चुनावों से पहले बीजेपी से नाराज हैं। नोटबंदी के बाद साल 2016 में जाट किसान नाराज थे। इसके बाद 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव हुए। दोनों ही बार बहुत से जाट वोटरों ने बीजेपी का समर्थन नहीं किया। इन दोनों ही चुनावों में बीजेपी ने पश्चिमी यूपी में क्रमश: 37 सीटों और 27 विधानभा क्षेत्रों में जीत हासिल की। यकीनन बीजेपी को किसानों का थोड़ा-बहुत समर्थन मिला होगा।

बीजेपी को किसानों के लगातार समर्थन के पीछे एक बड़ी वजह यह है कि वही एक ऐसा प्रमुख दल है जो किसानों की नुमाइंदगी करता है। साल 2007 के बाद से पश्चिमी यूपी के 18 में से 11 जाट विधायक बीजेपी के रहे। राष्‍ट्रीय लोकदल जोकि मुख्‍यत: जाटों की पार्टी है उसे साल 2012 में केवल छपरौली की सीट मिली।

कोई दूसरा विकल्‍प नहीं
दूसरी वजह यह है कि अगर मान भी लिया जाए कि मौजूदा असंतोष किसानों को बीजेपी से दूर कर देगा तब भी यह साफ नहीं होता कि ऐसा कौन सा दूसरा दल या गठबंधन है जो इससे फायदा उठा पाए। इस क्षेत्र में दूसरी प्रमुख पार्टी है बहुजन समाज पार्टी, लेकिन यूपी के दूसरे हिस्‍सों में उसका बुरा हाल है। टिकैत ने हालांकि किसानों की एक नई पार्टी का विचार पेश किया है लेकिन उससे वोटों का बंटवारा ही होगा जिससे अंतत: बीजेपी को ही फायदा होने वाला है। अभी तक समाजवादी पार्टी ने खुद को किसान आंदोलनकारियों से दूर ही रखा है। इसके अलावा किसान आंदोलन में मुख्‍यत: पश्चिमी यूपी के ही किसान हैं, इस तथ्‍य से भी पता चलता है कि उनके आंदोलन का असर राज्‍य के दूसरे हिस्‍सों पर नहीं पड़ने वाला।

प्रभावशाली नेता का न होना
तीसरी सबसे बड़ा कारण है इस किसान आंदोलन का दूसरे दलों और वर्गों से गठजोड़ कर पाने में नाकाम होना। 1970 और 80 के दशक में किसान राजनीति इसलिए प्रभावशाली थी क्‍योंकि उसके नेता इतने प्रभावशाली थे कि वे किसान हितों के पीछे दूसरे वर्गों और समूहों को भी एकजुट कर पाते थे। लेकिन आज की राजनीति अपनी-अपनी राजनीति है। कमोबेश, यही विरोधाभास बीजेपी को फायदा पहुंचाएगी।