करनाल में बुरे फंसे किसान नेता, न निगलते बन रहा ना उगलते, यहां देंखे

करनाल। करनाल में एसडीएम को सस्पेंड कराने की मांग लेकर अडे किसान नेताओं के लिये परिस्थिति मुश्किल हो गई है। देशभर में होने वाली किसान आंदोलन की चर्चा अब करनाल तक सीमित होती जा रही है। भाजपा के लिये ये स्थिति फायदेमंद साबित हो रही है, वहीं किसान नेताओं के लिये भयंकर दुविधा उत्पन्न हो गई है।

कृषि कानूनों का आंदोलन चलाने वाले सारे किसान नेता एक छोटी सी मांग को लेकर अब करनाल में डट गये है। खटटर सरकार एसडीएम को सस्पेंड करने के लिये तैयार नही है। किसान नेताओं के हर जगह अड जाने के रवैये ने किसान आंदोलन के दायरे को सीमित कर दिया है। अब अगर सारे दिग्गज किसान नेता मिलकर एक एसडीएम को सस्पेंड कराये बिना उठ गये तो किसान कानून वापस कराना तो दूर की बात है। किसान नेताओं के अतिउत्साह ने उन्हें इस मामले में फंसा दिया है। देश के कृषि मंत्री और प्रधानमंत्री को सीधी चुनौती देने वाले किसान नेताओं को अब करनाल के अफसरों से वार्तायें करनी पड रही है।

किसान नेताओं की सेकेंड पौध को करनाल में नेतृत्व की कमान देने के बजाय बडे किसान नेता खुद यहां अड बैठे, अब उनके लिये ऐसे ही उठना आसान नहीं होगा। भाजपा की मंशा है कि आंदोलन करनाल में सीमित हो जाये तो अच्छा है।

करनाल में घेरा डालने वालों में राकेश टिकैत, गुरुनाम सिहं चढ़ूनी और योगेंद्र यादव जैसे किसान नेता हैं। टीकरी और गाजीपुर बॉर्डर के बाद करनाल किसान आंदोलन का नया केंद्र बन चुका है। ऊपरी तौर पर भले ही लगे कि किसान सिर्फ अपने साथियों का सिर फोड़ने का हुक्म देने वाले एसडीएम आयुष सिन्हा को सस्पेंड कराने की मांग पर अड़े हैं, लेकिन यह अधूरा सच है।

असलियत तो यह है कि करनाल में किसान और निजाम के बीच पलक झपकने का खेल चल रहा है। किसानों को पता है अगर वो खट्टर सरकार से एक एसडीएम को सस्पेंड नहीं करवा पाए तो संसद से पारित तीन किसान बिल को वापस कराने का दंभ भरना आसान नहीं होगा। लोग कह रहे है कि हरियाणा सरकार अगर एसडीएम को संस्पेंड नहीं करती है तो इतने बड़े आंदोलन की कामयाबी पर ही सवाल उठने लगेंगे। ऐसे में तीनों कृषि कानूनों को वापस करने की मांग बेदम साबित होगी।

दूसरी तरफ खट्टर सरकार भी जानती है कि अगर किसानो की यह बात मान ली तो दिल्ली में किसानों के तीनों कानूनों को पारित कराने की मांग जोर पकड़ लेगी। किसानों के लिए करनाल में सिर्फ एक फायदा है, किसानों की भीड़ और रसद यहां आसानी से मिलती रहेगी, लेकिन किसानों की लडाई सीमित हो गई है इसमें कोई दो राय नहीं है।

क्या है पूरा मामला

28 अगस्त को किसान बसताड़ा टोल प्लाजा पर प्रदर्शन कर रहे थे, तभी किसानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया था। इस प्रदर्शन के दौरान कई किसानों को चोट आई थी. इसके अलावा तत्कालीन ैक्ड आयुष सिन्हा का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वो ’सिर फोड़ देने’ का आदेश देते हुए दिख रहे हैं। बसताड़ा टोल प्रदर्शन के दौरान ही पुलिस लाठीचार्ज में घायल हुए करनाल के रायपुर जाटान गांव के किसान सुशील काजल की भी मौत हो गई थी। इसे लेकर भी किसान गुस्से में हैं।