कच्चे तेल के दाम घटे, क्या अब मोदी सरकार भी घटायेगी पेट्रोल के दाम

पश्चिमी देशों में कोविड महामारी के डेल्टा वैरिएंट के बढ़ते मामलों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की क़ीमत सात प्रतिशत घटी, जो मंगलवार तक स्थिर हो गई.

कच्चे तेल के दाम के नीचे गिरने का एक और कारण था रविवार को तेल पैदा करने वाले देशों के संगठन ओपेक और ओपेक प्लस कहे जाने वाले देशों के बीच तेल के उत्पादन को बढ़ाने पर हुआ समझौता.

पिछले सप्ताह तेल उत्पादन के कोटे को लेकर दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के बीच हुए मनमुटाव ने दोनों देशों के बीच बातचीत को लटका दिया था, लेकिन रविवार को ये विवाद ख़त्म हुआ और एक बयान में ओपेक कार्टेल ने घोषणा की कि इराक़, कुवैत, रूस, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात उत्पादन बढ़ाएँगे.

लेकिन क्या भारत में पेट्रोल और डीजल की क़ीमतों में गिरावट होगी, जो इन दिनों 100 रुपए प्रति लीटर से भी अधिक है? भारत में तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों की क़ीमतों से निर्धारित होते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में घटती और बढ़ती क़ीमतों का सीधा असर भारत के आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा.

लेकिन पिछले कुछ सालों से रुझान ये देखने को मिला है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की क़ीमतों में कमी के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं. इसकी वजह केवल एक है वो ये कि केंद्र और राज्य सरकारें तेल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाती रहती हैं.

सरकार की कमाई
भारत सरकार ने अकेले जून में ख़त्म होने वाली तिमाही में तेल पर लगे एक्साइज ड्यूटी से 90,000 करोड़ रुपए से अधिक कमाई की. तो क्या इस बार भी ऐसा ही होगा?

वो कहते हैं, “ओपेक प्लस देशों के अधिक उत्पादन करने के निर्णय के साथ, निश्चित रूप से भारत में पेट्रोल और डीज़ल की खुदरा क़ीमतों पर प्रभाव पड़ेगा. वास्तव में, कच्चे तेल की भारतीय क़ीमत 19 जुलाई को घटकर 71.2 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी, जो 15 जुलाई को 75.26 डॉलर थी. बेशक, यह उसी समय संभव है, जब केंद्र सरकार या राज्य सरकार पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स नहीं बढ़ाती हैं. इसलिए क़ीमतों में काफ़ी हद तक गिरावट होनी चाहिए.”

वहीं चूड़ीवाला सिक्योरिटीज़ के अलोक चूड़ीवाला को लगता है कि सरकार एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाएगी और आम उपभोक्ताओं के लिए क़ीमतें कम नहीं होंगीं.

वो कहते हैं, “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की क़ीमतों में स्थिरता के साथ मुझे भारत में भी इसी तरह की गिरावट की उम्मीद नहीं है. केंद्रीय बजट पेश किए जाने के समय हर कोई कोविड के कारण भारी कर की उम्मीद कर रहा था. लेकिन कोविड-19 पर भारी ख़र्च और स्टिमुलस पैकेज दिए जाने के बावजूद ऐसा कुछ नहीं हुआ.”

उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की गिरावट के कारण सरकार को होने वाले अधिकांश लाभ को देखे हुए बजट में कर नहीं बढ़ाया गया था.

विवेक कौल के विचार में इस बार क़ीमत बढ़ाना सरकार की छवि के लिए सही नहीं होगा.

वो कहते हैं, “100 रुपए से अधिक की पेट्रोल की क़ीमत और 100 रुपए के क़रीब डीज़ल का दाम सरकार के लिए ख़राब पीआर है. इसलिए वे क़ीमतों में गिरावट को उपभोक्ताओं तक जाने देगी.”

अमेरिका और चीन के बाद भारत तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है. भारत अपनी ज़रूरत का 80 प्रतिशत से अधिक तेल आयात करता है.

भारत के इतिहास में पहली बार भारतीय शहरों में पेट्रोल की क़ीमतें 100 रुपये से अधिक तक पहुँच गई हैं और डीज़ल के दाम 100 रुपए प्रति लीटर के क़रीब हैं.

भारत में कच्चे तेल का दाम अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से जुड़ा है. इसका मतलब ये हुआ कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल का दाम घटता है, तो भारत में भी घटना चाहिए और अगर तेल की क़ीमत बढती है, तो यहाँ भी इसकी क़ीमत बढ़नी चाहिए.

लेकिन पिछले साल महामारी के बाद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जब तेल का दाम तेज़ी से गिरा, और गिर कर लगभग 20 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया, तो इसके बावजूद भारत में पेट्रोल की क़ीमत घटने के बजाए तेज़ी से बढ़ी. सिंगापुर में भारतीय मूल की ऊर्जा विशेषज्ञ वंदना हरी कहती हैं कि इसकी वजह है भारत सरकार की ओर से तेल पर दो बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाना. कई राज्य सरकारों ने भी ऐसा ही किया.

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इस समय कच्चे तेल की क़ीमत 68-70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है, यानी पिछले साल मार्च-अप्रैल के मुक़ाबले दाम 80 प्रतिशत ज़्यादा हैं. विपक्ष का आरोप है कि अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के कारण पेट्रोल और डीजल के दाम तेज़ी से बढ़ रहे हैं.

कांग्रेस पार्टी ने भारत सरकार के टैक्स को ‘मोदी टैक्स’ कहा और तर्क दिया कि अगर प्रधानमंत्री “‘मोदी टैक्स” हटा दें, तो दाम 60 रुपए प्रति लीटर हो सकता है. पार्टी के मुताबिक़ सरकार ने पिछले सात सालों में अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाकर 20 लाख करोड़ रुपए कमाए हैं.