आपके बच्चे के DNA पर चीन की नजर, चुरा कर देना चाहता है इस बडे काम को अंजाम

नई दिल्ली: देश के DNA के बाद हम चीन की DNA वाली चोरी का विश्लेषण करेंगे. कल्पना कीजिए कि आज से 15 साल बाद एक बार फिर से गलवान में भारत और चीन के सैनिकों की भिड़ंत हो जाए. भारत के सैनिक चीन के सैनिकों को पीट रहे हैं, मार रहे हैं. लेकिन इसका चीन के सैनिकों पर कोई असर नहीं हो रहा, न तो चीन के सैनिकों को ठंड लग रही है, न उनका खून जम रहा है और न ही भारतीय सैनिकों के हाथों पिटने से चीन के सैनिकों को कोई दर्द हो रहा है.

कल्पना को हकीकत बनाने पर काम कर रहा चीन
भारत के सैनिक माइनस 30 डिग्री तापमान में सिर्फ देशभक्ति की गर्मी के सहारे लड़ रहे हैं, जबकि चीन के सैनिक किसी रोबोट की तरह लड़ रहे हैं. ये आपको किसी फिल्मी कहानी जैसा लग रहा होगा, लेकिन चीन इसी कल्पना को हकीकत बनाने पर काम कर रहा है और इसके लिए चीन दुनिया भर के बच्चों के शरीर से उनका डीएनए चुरा रहा है. इसी चोरी के सहारे चीन इंसानों की एक नई प्रजाति बनाने की कोशिश कर रहा है, जिन्हें सुपर ह्यूमन्स कहा जाता है. ये भविष्य की एक ऐसी खबर है जिसके बारे में आपको आज ही पता होना चाहिए.

ये ऐसे इंसान और सैनिक होंगे, जिनके मन में ना तो भावनाएं होंगी न इन्हें दर्द होगा और न ही इन्हें ठंड और गर्मी का एहसास होगा. चीन ये सब इंसानों के डीएनए में मौजूद जीन्स को एडिट करके करना चाहता है. यानी चीन ने पहले लैब में एक खतरनाक वायरस बनाया जिससे आज पूरी दुनिया परेशान है और अब वो लैब में ही इंसानों की एक ऐसी प्रजाति बना रहा है, जो शायद परमाणु बम से भी ज्यादा खतरनाक होगी.

जेनेटिक डेटा चुराने का आरोप
इंसानों के जीन्स पर स्टडी करने वाली चीन की कंपनी बीजीआई ग्रुप पर आरोप लगा है कि इस कंपनी ने चीन की सेना के साथ मिलकर दुनिया भर की 80 लाख से ज्यादा महिलाओं के गर्भ में पल रहे बच्चों के जेनेटिक डेटा को चुराया है. ताकि चीन इस डेटा की मदद से सुपर ह्यूमन्स की एक ऐसी प्रजाति तैयार कर सके जिन्हें युद्ध में हराना नामुमकिन हो जाए.

BGI का पूरा नाम बीजिंग जीनोमिक्स इंस्टीट्यूट है. आरोप है कि बीजीआई ने ऐसा करने के लिए चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के साथ मिलकर गर्भवती महिलाओं के लिए एक टेस्ट विकसित किया, जिसे NIFTY टेस्ट कहा जाता है. वर्ष 2013 में बीजीआई ने दुनिया भर के देशों में इस टेस्ट की मार्केटिंग शुरू की.

इसके तहत गर्भवती महिलाओं के शरीर से DNA के कुछ सैंपल्स लिए जाते हैं और फिर इन सैंपल्स को स्टडी करके ये पता लगाया जाता है कि कहीं जन्म लेने वाले बच्चे को डाउन सिंड्रोम जैसी कोई बीमारी तो नहीं है. टेस्ट करने की ये तकनीक बीजीआई दुनिया के 52 से ज्यादा देशों को बेचता है. जिनमें ब्रिटेन, यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, थाइलैंड और भारत समेत 52 देश शामिल हैं. भारत में भी अब इस टेस्ट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने लगा है. भारत में निफ्टी टेस्ट का खर्च 12 से 13 हजार रुपये है. हालांकि अभी इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है कि चीन ने भारत से भेजे गए सैंपल्स से भी जेनेटिक डेटा चुराया है या नहीं?

ये टेस्ट डीएनए की जांच करने वाली लैब्स में किए जाते हैं. ये लैब्स 7 से 10 दिन में रिपोर्ट जारी करती हैं और मातापिता को ये पता लग जाता है कि कहीं उनके बच्चे को कोई गंभीर बीमारी तो नहीं है. भारत में हजारों लैब्स और सेंटर्स पर इस टेस्ट की सुविधा उपलब्ध है.

कैसे लिया जाता है डीएनए का सैंपल?
किसी भी इंसान के शरीर से डीएनए का सैंपल हासिल करना उतना मुश्किल नहीं है, जितना मुश्किल ये लगता है. इसके लिए आपके सिर का एक बाल, आपका टूथब्रश, आपका नाखून, आपके द्वारा पी गई सिगरेट की बट्स और आपकी चबाई हुई च्युइंग गम जैसी मामूली सी चीज़ें काम आ सकती हैं. यानी आपके शरीर के डेटा को चुराना आपके मोबाइल फोन के डेटा को चुराने से भी आसान है और यही काम अब चोरी में माहिर चीन पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर कर रहा है.

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