महाराष्ट्र: कुर्सी खतरे में देख CM उद्धव ठाकरे ने मांगी PM मोदी से मदद

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पीएम मोदी को फोन कर मदद मांगी है. कोरोना वायरस या लॉकडाउन को लेकर नहीं बल्कि संकट में पड़ी अपनी कुर्सी बचाने के लिए. इंडिया टुडे के सोर्सेज के मुताबिक उद्धव ठाकरे ने पीएम मोदी से कहा है कि संकट के इस समय में किसी भी तरह की राजनैतिक अस्थिरता प्रदेश के लिए सही नहीं होगी. इससे लोगों के बीच गलत मैसेज भी जाएगा. इसलिए इस परिस्थिति से बचना चाहिए. सोर्सेज के मुताबिक प्रधानमंत्री ने उद्धव को भरोसा दिलाया है कि वे जल्द ही इस मसले को देखेंगे.
दरअसल इस फोन कॉल के एक दिन पहले ही यानी 27 अप्रैल को महाराष्ट्र कैबिनेट ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पास एक प्रस्ताव भेजा था. कि उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र विधान परिषद में नॉमिनेट किया जाए. लेकिन राज्यपाल की तरफ से अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है. संवैधानिक संकट बढ़ता देख उद्धव ने पीएम मोदी को फोन कर मदद मांगी है. उद्धव ठाकरे राज्य के मुख्यमंत्री हैं. लेकिन किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं. न तो विधानसभा, न ही विधान परिषद.

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संविधान का अनुच्छेद 164 (4) कहता है कि किसी भी सदन का सदस्य हुए बिना व्यक्ति 6 महीने से ज़्यादा राज्य में किसी भी मंत्री पद पर नहीं रह सकता. उद्धव ने 28 नवंबर,-2019 को सीएम पद की शपथ ली थी. 28 मई को छह महीने पूरे हो रहे हैं. तब तक किसी सदन के सदस्य नहीं बने, तो मुख्यमंत्री पद जा सकता है.

उद्धव ने विधानसभा चुनाव तो लड़ा ही नहीं था. लेकिन अब महाराष्ट्र के विधान परिषद के नौ सदस्यों का कार्यकाल 24 अप्रैल को खत्म हो रहा है. इन्हीं में से एक सीट पर उद्धव ने चुनाव लड़ने की सोच रखी थी. लेकिन उनके लिए दिक्कत तब हो गई, जब कोरोना वायरस के चलते चुनाव अनिश्चितकाल तक के लिए टल गए. इसी के साथ उद्धव का विधान परिषद सदस्य बनना भी अनिश्चितकाल के लिए टल गया.
आगे क्या विकल्प हैं?

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं –
“उद्धव ठाकरे के पास दो विकल्प हैं.

1- राज्यपाल कोटे से उनके नाम की सिफारिश कर दी जाए और वो विधान परिषद के सदस्य बन जाएं.

2- 28 मई को छह महीने पूरे होते ही उद्धव इस्तीफा दे दें. एक-दो दिन के भीतर ही राज्यपाल की सहमति से दोबारा मुख्यमंत्री चुन लिए जाएं. इस तरह उन्हें फिर छह महीने का वक्त मिल जाएगा.”

सुभाष कश्यप साफ कर देते हैं कि इन दोनों में से कोई भी तरीका नैतिकता के लिहाज से सही नहीं है. फिर भी कम अनैतिक तरीका पहला वाला ही है. और एक बात. इन दोनों विकल्पों में एक बात डिसाइडिंग फैक्टर रहेगी कि राज्यपाल क्या चाहते हैं? उनका स्व-विवेक क्या कहता है? अब राज्यपाल की तरफ से कोई जवाब न मिलता देख उद्धव ने पीएम से मदद मांगी है. पीएम की तरफ से कितनी मदद मिलती है, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

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